दर्द -ए -इश्क़
इश्क़ में हम इस क़दर बर्बाद हुए की
आबाद होने के अब कोई आसार ही नहीं।
भीड़ में भी हम इतना तन्हा हो गए की
इन तन्हाइयों से हमे कोई ऐतराज़ नहीं।
जल रही है जिंदगी ऐसे धुएं में
जैसे कम न होगी ये आग कभी।
आँसुओं में भीगी ये पलके याद दिलाये की
जीना ऐसे किसी सजा से कम तो नहीं।
तेरे होने या न होने से अब कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं
क्यूंकि राहत तो अब तेरे पास भी नहीं।
आस्था जायसवाल
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